Sunday, August 9, 2020

लड़की को बचपन से ही लज्जा का आभूषण पहना कर,उनसे निर्लज्जता की बातें क्यो..?


लड़की को बचपन से ही लज्जा का आभूषण पहनाकर, निर्लज्जता की बातें क्यो..?   (एक विचार)
********************************************
मैं मानती हूँ, लज्जा शर्म नारी को शोभित करने वाला बहुत ही आकर्षित और खूबसूरत आभूषण है! ये नारी के व्यक्तित्व को एक अलग ही निखार देता प्रतीत होता है! परन्तु कभी सोचा है इस आभूषण को धारण करने वाली स्त्रियों को न जाने कितनी गंदी सोच और कितनी ही अपमान जनक स्थिति का सामना करना पड़ता है ..?
वो लोक लाज व शर्म के चलते अपनी स्थिति से किसी को अवगत भी नही करा सकती, क्यो..?? 
क्योंकि उसे बचपन से ही सिखाया जाता है लज्जा आपका गहना है, इसको आपने हमेशा पहनना है... लड़की इसका सर झुका कर पालन भी करती है परंतु मुझे समझ नही आता जब लड़की को लज्जा का आभूषण बचपन से ही पहना दिया जाता है तो फिर उनके साथ निर्लज्जता की बातें क्यो की जाती है...?
अक्सर देखा गया है राह चलते लड़कियों के साथ छेड़छाड़ होती है वो कई बार लज्जा के करण चुप लगा जाती है , फेसबुक पर ही बहुत से मित्र, या ऑफिस में सहकर्मचारी  अश्लीलता की हद तक पार कर देते है ...
ऐसी परिस्तिथि में अपने संस्कार व गले मे जबर्दस्ती पहनाये गये लज्जा नामक आभूषण के चलते स्त्री खुद में ही घुट कर रह जाती है..
और अगर कोई स्त्री उन सब के विरुद्ध आवाज़ उठाना चाहे तो उसे निर्लज्ज की उपलब्धि से नवाज़ दिया जाता है....
मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगी अगर सच मे ही लज्जा स्त्री का गहना है तो इसे सदैव धारण किये रहने में आप स्त्री को प्रेरित व सहयोग करें ऐसी स्थिति उत्पन्न न करें कि वो अपने आत्मसम्मान की ख़ातिर इस आभूषण का परित्याग कर दे....

©️✍🏻पूनम बागड़िया "पुनीत"
                   (नई दिल्ली)

Tuesday, August 4, 2020

"तुम डिजिटल संसार प्रिये"


****************"तुम डिजिटल संसार प्रिये"**********


तुम ठहरे लव आजकल
मैं मीरा सा प्यार प्रिये!!

किस विध करू तुम्हारा सृजन
तुम डिज़िटल संसार प्रिये!!

मैं नेत्रों की भाषा में उलझी
तुम अनदेखा दुलार प्रिये!!

देख एक क्षण, मैं जीती बरसों
तुम देख ऑफलाइन, दूजे को देते अपना दिल उपहार  प्रिये!!

मैं प्रेम-पत्र पर बिखरी अभिव्यक्ति
तुम कॉपी पेस्ट का प्रचार प्रिये!!

किस विध करू तुम्हारा सृजन
तुम डिज़िटल संसार प्रिये!!

सँजोह कर रखती मैं यादें दिल में
तुम मोबाइल गैलरी का भंडार प्रिये!!

मेरे ह्रदय में एक ही समाये
तुम रख सकते हज़ार प्रिये!!

किस विध करू तुम्हारा सृजन
तुम डिज़िटल संसार प्रिये.!!

©✍🏻पूनम बागड़िया "पुनीत"
               (दिल्ली)
स्वरचित मौलिक
Translation in English

"You darling digital world"

 You stay love nowadays
 I love me sweetie !!

 Which method should you create
 You digital world honey !!

 I got involved in the language of the eyes
 You undiscovered caress honey!

 See one moment, I lived for years
 Seeing you offline, give your heart a gift to my friend !!

 I express expression on love letter
 You darling copy paste !!!

 Which method should you create
 You digital world honey !!

 I have memories in my heart
 You dear mobile gallery store !!

 One heart in my heart
 You can keep a thousand darling !!

 Which method should you create
 You darling the digital world. !!

 © ✍🏻Poonam Bagadia "Punit"
                (Delhi)
 Composed original

Friday, July 31, 2020

"हाँ..ज़िद है"

##############शीर्षक : "हाँ....ज़िद है"##############

आज फिर एक ज़िद की है,
सोई ज़िद जगाने की!

आंख से गिरे सपने को फिर से, सजाने की!

थम गई थी जो, उस जिन्दगी को चलाने की !

हाँ... ज़िद की है मैंने, आसमां अपना बनाने की!

ज़र्रे से खुद को आफ़ताब कराने की!

इस झूठी दुनिया मे, सच को न छिपाने की!

हाँ ... ज़िद है, हर एक को आइना दिखाने की!

तेरी सूरत में कितने धोखे छिपे है 
ये राज़ तुझे बताने की!

हाँ .... मुझे ज़िद है, तेरी हर ग़लती तुझे गिनाने की!

अपनी गलतियों से सीख लेने की उसे सुधार पाने की!

हाँ... मैंने ज़िद की है, अपनी गलतियों से बाहर आने की!

हर रिश्ते में सुराख हुए है, अब बारी है उन्हें  भराने की!

हाँ... ज़िद है मेरी, हर रिश्ता बचाने की!

कभी सोया था जो भूखा उस गरीब के घर चूल्हा जलाने की!

हाँ... मेरी ज़िद है, ग़रीब नही ग़रीबी हटाने की!

धर्म के पिंजरे से अब सब को आज़ाद कराने की!

हाँ.... मैंने ज़िद की है हर एक को इंसानियत सिखाने की!

©️✍🏻पूनम बागड़िया "पुनीत"
                      (नई दिल्ली)
स्वरचित मौलिक रचना



Title: "Yes .... Zid is"

 Today is a stubbornness again,
 Soi Zid to awaken!

 Decorate the fallen eye, again!

 Who had stopped, to run that life!

 Yes ... I have stubbornly, to make my own!

 To make yourself a favorite with Zare!

 In this false world, do not hide the truth!

 Yes ... stubbornness, to show everyone a mirror!

 How many deceptions are hidden in your face
 To tell you this secret!

 Yes… I have stubbornness, every mistake of yours to count you!

 Learn from your mistakes to get it corrected!

 Yes ... I insisted, to come out of my mistakes!

 There are holes in every relationship, now it's time to fill them!

 Yes ... My stubbornness is to save every relationship!

 Never slept, that starved the poor's house to burn the stove!

 Yes ... My stubbornness is not to remove poverty!

 Now to free everyone from the cage of religion!

 Yes… I have insisted on teaching humanity to everyone!

 © ✍🏻poonam Bagadia "Punit"
                       (new Delhi)
 Composed original composition

Sunday, June 7, 2020

चरित्रहीन कौन..?

           







 *************शीर्षक : "चरित्रहीन कौन..??"*******

स्टेशन आने ही वाला था, प्रिया ने सोचा "जनाब को बता दिया जाये कि उनके जन्मदिन को विशेष बनाने के लिये, उनकी होने वाली पत्नी उनके पास आ रही है"
.
ये सोच कर प्रिया ने फिर से विनय को फोन किया....
इस बार भी उसका फोन स्वीच ऑफ था...
प्रिया के कोमल हृदय में कई डर और सवालों के तार झंकृत हो उठे...
"ऐसा तो कभी नही हुआ..विनय हमेशा फोन का विशेष ध्यान रखते है, फ़िर आज फोन बंद क्यों...??"
"कहीं विनय की तबीयत तो नही बिगड़ गई."
अपने विचारों में उलझी प्रिया स्टेशन पर उतरी.!

वो जल्द से जल्द विनय के पास पहुँचना चाहती थी.!

 विनय को आश्चर्यचकित करने के लिये दूसरी चाभी से दरवाजा खोला और चुप चाप अंदर चली गयी..!

जैसे ही  प्रिया ने विनय के कमरे का दरवाजा खोला, वो लगभग गुस्से से चीख़ते हुऐ बोली..

"ये... ये कौन है..??

विनय ने हड़बड़ा कर आँखे खोली   और खुद को संभालते हुए बोला

"ये मेरी दोस्त है"

"दोस्त.... दोस्त है तो तुम्हारे बेड रूम में क्या कर रही है..??"

प्रिया गुस्से से तिलमिलाते हुये बोली!
विनय को समझ नही आ रहा था वो क्या बोले

"ये मुझे प्यार करती है"

और तुम...??

"मैं तो तुम से ही प्यार करता हूँ"

विनय ने प्रिया को फुसलाने की कोशिश की..!

"तो इसके साथ क्यो हो तुम..??

"बाबू... प्लीज मुझे माफ़ कर दो...
आखिर मैं इंसान ही हूँ, गलती हो गई"

"अब अपनी गलती सुधारो और इस लड़की से ही शादी कर लो"

 रोते हुये प्रिया ने अपनी अंगुली से  सगाई की अँगूठी निकल कर विनय के हाथ पर थमा दी.!

"शादी...... और इससे...
अरे चरित्र हीन है ये... जो बिना शादी के ही ये सब...

विनय अपनी बात पूरी भी नही कह पाया था कि उस लड़की ने एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर रख दिया.!

"मुझे तुमसे प्यार था, इसलिए मैं तुम्हारे साथ थी...
पर तुम्हे तो किसी और से प्यार था, फिर तुम मेरे साथ क्यों थे....??"

 कहते हुए वो फुट फुट कर रोने लगी.!
इस बार गुस्से से भरी प्रिया ने विनय को तमाचा लगाया और आक्रोश युक्त सुर्ख आँखो से उसे देखा, मानो खामोश नज़रो से उसकी शख्शियत को तौल रही हो की असल मे, चरित्र हीन कौन है...??

-पूनम बागड़िया "पुनीत"
              (दिल्ली)

स्वरचित,मौलिक रचना